सच कहूं तो जब मैंने अपने पड़ोस में रहने वाले रिटायर्ड शर्मा जी को महीने के आखिर में 1000 रुपए की पेंशन से दवाई खरीदते देखा था तब समझ आया कि यह सिर्फ आंकड़ों का मामला नहीं है। यह उन लाखों बुजुर्गों का जीवन-संघर्ष है जिन्होंने अपना सबकुछ देश की सेवा में लगा दिया। आज अच्छी खबर यह है कि इसी संघर्ष को कम करने की एक नई उम्मीद जगी है। EPS-95 के तहत मिलने वाली न्यूनतम मासिक पेंशन को 1000 रुपए से बढ़ाकर 7000 रुपए या 7500 रुपए करने की मांग अब जोर पकड़ रही है।
बुजुर्गों को बच्चों के आगे हाथ फैलाने की मजबूरी
मेरे हिसाब से यह मांग सिर्फ पैसे की नहीं बल्कि सम्मान की लड़ाई है। आज के दौर में 1000 रुपए से क्या होता है दो दिन की दवाई या एक हफ्ते का राशन भी मुश्किल से आ पाता है। कल्पना कीजिए एक बुजुर्ग जो पूरी जवानी किसी फैक्ट्री या दफ्तर में मेहनत करके लाया, उसे बुढ़ापे में अपने बच्चों के आगे हाथ फैलाने पर मजबूर होना पड़ता है। यह दर्द सिर्फ वही समझ सकता है जिसने देखा है।
सबकी नजरें अब बजट सत्र पर EPFO में जारी हैं
अब सवाल यह है कि यह बदलाव कब तक आएगा? फिलहाल, केंद्रीय श्रम मंत्रालय और EPFO के स्तर पर इस पर गंभीरता से चर्चा हो रही है। कर्मचारी संगठन लगातार दबाव बना रहे हैं और संभावना जताई जा रही है कि आने वाले बजट सत्र में यह मुद्दा उठ सकता है। अगर सब कुछ ठीक रहा, तो 2026 तक हमें एक ठोस फैसला देखने को मिल सकता है। यह कोई छूट नहीं, बल्कि उनका अधिकार है जो सालों से महंगाई के सामने बेबस हैं मुझे लगता है कि पेंशन बढ़ोतरी सिर्फ आर्थिक राहत नहीं बल्कि एक सामाजिक न्याय है। जब एक बुजुर्ग को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, तो उसके चेहरे पर जो आत्मविश्वास और सम्मान लौटेगा, वह किसी भी रकम से ज्यादा कीमती है। यह बदलाव उनकी गरिमा वापस दिलाएगा।
कोई घोषणा नहीं लेकिन आवाज बुलंद है
अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से यह आवाज बुलंद हो रही है, उससे उम्मीद की एक किरण जरूर दिखती है। हम सभी की यही कोशिश होनी चाहिए कि हमारे बुजुर्ग सम्मान से अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव को पार कर सकें। आइए इस उम्मीद को बनाए रखें कि जल्द ही वह दिन आएगा जब शर्मा जी जैसे लाखों पेंशनधारकों की आंखों में चिंता की जगह खुशी होगी।